फटे-पुराने कपड़ों में घूमती फ़ेय को लोग लालची औरत कहकर ठुकराते हैं, फिर भी वही एक शक्तिशाली आदमी की मदद कर सकती है, और दांव पर है अरबों रुपये का सौदा। फ़ेय जब कमरों में दाखिल होती है, तो एक शब्द बोलने से पहले ही लोग तय कर लेते हैं कि वह कौन है। फुसफुसाहटें उसे लालची औरत करार देती हैं, और जो भी उसे नीचा दिखाना चाहता है, उसके लिए वह आसान निशाना बन जाती है। फिर सच्चाई सामने आने लगती है: इस कहानी के केंद्र में मौजूद उस आदमी को सिर्फ़ वही ठीक कर सकती है। अचानक जिन लोगों ने उसका मज़ाक उड़ाया था, उन्हें उसकी ज़रूरत पड़ जाती है, और हर अपमान सौदेबाज़ी का मोहरा बन जाता है। मुख्य तनाव फ़ेय और उस शक्तिशाली आदमी के बीच है, जिसकी मदद करने के लिए वह बंधी है। उनका समझौता कागज़ पर व्यावसायिक है, पर हर मुलाकात दोनों को करीब खींच लाती है और उन्हें वह स्वीकार करने पर मजबूर करती है जो वे सचमुच चाहते हैं। जैसे-जैसे उसकी कीमत साफ़ होती है, दांव बढ़ते जाते हैं। करार एक सीधे लेन-देन से ज़्यादा एक ऐसे जाल जैसा लगने लगता है, जिससे कोई भी आसानी से निकल नहीं सकता। फ़ेय के लिए यह सौदा छोड़ना मतलब वह सब खोना है जो उसने संघर्ष से पाया है, और वह आदमी उस औरत को अनदेखा नहीं कर सकता जिसे बाकी सबने ठुकरा दिया था। इस कहानी का लहजा तीखी सामाजिक टिप्पणी और धीरे-धीरे पनपते रोमांस का मेल है, जहाँ कपड़े, पैसा और स्वाभिमान किसी भी बड़े टकराव जितना ही वज़न रखते हैं। अगर आपको ऐसी कहानियाँ पसंद हैं जिनमें कम आंकी गई नायिका अपने आलोचकों को मात देती है, तो फटेहाल देवी और उसका अरबों का करार इस शैली पर एक साहसी और दिलचस्प प्रस्तुति है। इसका आकर्षण केंद्र में मौजूद अनुबंध वाली शादी और उस अमीर आदमी में है जिसे दिखावे के पार देखना सीखना होगा। असली सवाल यह है कि फ़ेय कब तक अपना संयम बनाए रख पाएगी, इससे पहले कि कोई उसे हद से आगे धकेल दे।